ZINDAGI
तूफ़ान से शाहिल का पता पूछते रहे ,
हम मौत से जीने की अदा सीखते रहे !
हम जिनके घर की आग बुझाने में जल गए ,
पत्थर हमारे घर में वही फेकते रहे !
अब क्या बताये दौरे तक़दीर से क्या मिला ,
पानी के बदले अपना लहू बेचते रहे !
इस दौर के तारीख में इज्ज़त मिली उन्हें ,
लासों के जिस्म से जो कफ़न खीचते रहे !
सूरत हमारे गाँव की कितनी बदल गई ,
अपनी गली में अपना ही घर खोजते रहे
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